In Ghazal Nazm Qawwali The EDIT PAGE Urdu poetry गजल

A comparative study of Qawwali, Ghazal and Nazm




Qawwali has the same place in Sufism as Bhajan, kirtan or Kazli has in Hinduism.

Originated around the eighth century in Persia, its popularity increased when Amir khusro fused this Persian Qawwali with Indian Music. A Qawwali includes many facets viz, Sufi philosophy, admiration of Khuda Rasul, Iltaza Dasudo Kharif to God, Shokhi-e-hushn-o-Ishq faces of Jashn or Mehfil. It depends on us which mood/face do we face to face.

Qawwali can be factored as (Q) kaak+aali= (Q) Kakali, meaning - कौवों का झुण्ड: As crows are vociferous, those crowds of people were therefore called Qawwal. Another meaning is Kaw+wali (कव +वली; वली stands for Mahatma). To organise it is known as Mehfil-e-Samaa (समा), where the meaning of Samoa is to listen, to sing and dance.

Qawwali listeners and singers are known for their unconsciousness. They do it so keenly that they become unconscious to the world. Qawwali is also known as the Tareeka-e-Ibadat for Akbaal-e-Buzurg aane deen and Masaail-e-tasauvuf. The different types of Qawwali are the Ghazals of Qaul or Tasauwuf, Mukhammsh, Musallam, Masnavi..etc.

In accord with Sufism, Kalb (heart) is that highest position of the soul, related to wisdom (बुद्धि) and breath (नफस) - when every part of the body is in the same mood that leads to the birth of the word Qaul (कौल*). People singing Qaul is known as qawwaal. 'Qaul' also refers to the Arabian style of singing.

Further, 'Qaul' largely refers the statement, promise, voice of Sufi the style of singing of Qawwali. A Qawwali consists of Taan, Palta, ZamZamaa, Boletc. Can you differentiate them in the following Qawwali of Amir khusro sung by none other than Nusrat.

हैदरिअम क़लन्दरम मस्तम, बन्दा\-ए\-मुरतज़ा अली हस्तम
सरगरोह\-ए\-तमाम रिन्दनम, केह सग-ए-कु-ए-शेर-ए-यज़्दनम

ऐ, मन कुन्तो मौला, अली मौला
एक सूरत की दो ह मूरतिय
ुन्तो मौला, अली मौ
एक मोहम्मद, एक अली
मन
कुला
ही तो पाक ह मक़्सूद\-ए\-क़ायनत ख़ैर\
बेदम य-उन\-निसा हुस्सैन हसन मुस्तफ़ा अली
स्बीह तो फ़रिश्तों ने भी
मन कुन्तो मौला, अली मौला इस नाम की त पढ़ी ह मन कुन्तो मौला फ़'अ अली उन मौला, फ़'अ अली उन मौला
ी यालली याला याला रे, यालला यालला यालला रे..... मन कुन
फ़, ददर्इल ददर्इल ददर्आनी, हम तुम तनननन, तनननन रे..... याल ली मौला, अली मौला म सदक़े नि मौला, मन कुन्तो मौला अहा मेरे अली मौला, मन कुन्तो मौला एक सूरत की ...
-ए\-पयम्बर थी, तो ये मोलुद\-ए\-क'आब थे नब
हुई कब असी शादी, हज़रत\-ए\-आदम से ता 'इसा के दुलहन फ़ातिमा ज़ोहरा, अली अल-मुरतज़ा दुल्हा जो वो बिन्त \ के घर की थी बेटी, ख़ुदा के घर का था बेटा अली मौला, मौला, अली मौला द देरे.... मौला, अली मौला ये नाम कोई काम बिगड़ने नहीं देता
बिगड़े भी बना देता ह सब काम अली मौला, मौला अली मौला द द दन दर दम, त दिरि दिरि दम अली मौला, मौला अली मौला ऐ मन कुन्तो मौला ..
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Coming to Ghazals and Nazm. They are different forms of Hindi-Urdu poetry.

Ghazal so far the most famous section of Hindi-Urdu poetry is assumed to be Subjective while Nazm as Objective. K.C. Kanada in his book "Masterpieces of Urdu Nazm" clarifies the Subjective poetry as those in which poet search inward finds all the problems and solution within, contrary to the Objective where poet search outside. Nazms are more often longer but it has no limitation it can be of 12 lines to 186 lines(The famous Nazm of Iqbal "Shikwa" was 186 lines.) let's have a look on Kaifi's Nazm "उठ मेरी जान मेरे साथ ही चलना है तुझे " which he wrote for his daughter Sabana Azmi published by "Hans" after his death.


उठ मेरी जान! मेरे साथ ही चलना है तुझे



कल्ब-ए-माहौल में लरज़ाँ शरर-ए-ज़ंग हैं आज
हौसले वक़्त के और ज़ीस्त के यक रंग हैं आज
आबगीनों में तपां वलवला-ए-संग हैं आज
हुस्न और इश्क हम आवाज़ व हमआहंग हैं आज
जिसमें जलता हूँ उसी आग में जलना है तुझे


उठ मेरी जान! मेरे साथ ही चलना है तुझे



ज़िन्दगी जहद में है सब्र के काबू में नहीं
नब्ज़-ए-हस्ती का लहू कांपते आँसू में नहीं
उड़ने खुलने में है नक़्हत ख़म-ए-गेसू में नहीं
ज़न्नत इक और है जो मर्द के पहलू में नहीं
उसकी आज़ाद रविश पर भी मचलना है तुझे
उठ मेरी जान! मेरे साथ ही चलना है तुझे


गोशे-गोशे में सुलगती है चिता तेरे लिये
फ़र्ज़ का भेस बदलती है क़ज़ा तेरे लिये
क़हर है तेरी हर इक नर्म अदा तेरे लिये
ज़हर ही ज़हर है दुनिया की हवा तेरे लिये
रुत बदल डाल अगर फूलना फलना है तुझे
उठ मेरी जान! मेरे साथ ही चलना है तुझे

क़द्र अब तक तिरी तारीख़ ने जानी ही नहीं
तुझ में शोले भी हैं बस अश्कफ़िशानी ही नहीं
तू हक़ीक़त भी है दिलचस्प कहानी ही नहीं
तेरी हस्ती भी है इक चीज़ जवानी ही नहीं
अपनी तारीख़ का उनवान बदलना है तुझे
उठ मेरी जान! मेरे साथ ही चलना है तुझे

तोड़ कर रस्म के बुत बन्द-ए-क़दामत से निकल
ज़ोफ़-ए-इशरत से निकल वहम-ए-नज़ाकत से निकल
नफ़स के खींचे हुये हल्क़ा-ए-अज़मत से निकल
क़ैद बन जाये मुहब्बत तो मुहब्बत से निकल
राह का ख़ार ही क्या गुल भी कुचलना है तुझे
उठ मेरी जान! मेरे साथ ही चलना है तुझे

तोड़ ये अज़्म शिकन दग़दग़ा-ए-पन्द भी तोड़
तेरी ख़ातिर है जो ज़ंजीर वह सौगंध भी तोड़
तौक़ यह भी है ज़मर्रूद का गुल बन्द भी तोड़
तोड़ पैमाना-ए-मरदान-ए-ख़िरदमन्द भी तोड़
बन के तूफ़ान छलकना है उबलना है तुझे
उठ मेरी जान! मेरे साथ ही चलना है तुझे

तू फ़लातून व अरस्तू है तू ज़ोहरा परवीन
तेरे क़ब्ज़े में ग़रदूँ तेरी ठोकर में ज़मीं
हाँ उठा जल्द उठा पा-ए-मुक़द्दर से ज़बीं
मैं भी रुकने का नहीं वक़्त भी रुकने का नहीं
लड़खड़ाएगी कहाँ तक कि संभलना है तुझे
उठ मेरी जान! मेरे साथ ही चलना है तुझे


Ghazals are comparatively shorter 6-7 pair of lines; Yes Ghazal like a Sonnet always found to be in pairs. Now Each of these pairs has detachability, completeness in the form of individual verses. If in the first pair poet talks about death, admire death in the next pair he may wish to adore the beauty of life. They can be read individually. While in a Nazm which evolves with an idea flows continuously with thoughts identifying and boosting the Idea throughout so all the lines are generally interrelated, Even in a long Nazm where the object may change but slowly. In the above Nazm, following few lines can also be written as Ghazal but they still don't represent the Individual verses of Ghazal.

कल्ब-ए-माहौल में लरज़ाँ शरर-ए-ज़ंग हैं आज
हौसले वक़्त के और ज़ीस्त के यक रंग हैं आज


आबगीनों में तपां वलवला-ए-संग हैं आज

हुस्न और इश्क हम आवाज़ व हमआहंग हैं आज

Unlike Ghazal in which poet flies with the idea of love life death beyond logically illogical, Nazm prefers to be on the ground. Both Ghazal and Nazm originated from the Old versed poetry viz. Masnavi ( a rhythmic poem about romantic or religious theme) Marsia (poems of Karbala famous; Describing Hasan and Hussain) Qasida (Rhythmic poem to adore someone).

Doha is also Hindi couplets they differ from Ghazals in their origin, punctuation and pronunciation. But there's always a probability of intrusion. The following lines are the verse of Dohe written by Nida Fazli, for the album Insight sung by Jagjit Singh. Note that like Ghazals there also each couplet shows its individual completeness. By syntax, hey are like Ghazals but still differ in their Rhyme and punctuation.


मैं रोया परदेस में, भीगा माँ का प्यार|

दुःख ने दुःख से बात कि, बिन चीठी बिन तार||


छोटा कर के देखिए जीवन का विस्तार|
आंखों भर आकाश है, बाहों भर संसार||



लेके तन के नाप को, घूमे बस्ती गाँव|

हर चादर के घेर से, बाहर निकले पाँव||


सब कि पूजा एक सी, अलग अलग है रीत|
मस्जिद जाये मौलवी, कोयल गाए गीत||

पूजा घर में मुर्ति, मीरा के संग शाम|
जिसकी जितनी चाकरी उतने उसके दाम||

नदिया सींचे खेत को, तोता कुतरे आम|
सूरज ठेकेदार सा, सब को बांटे काम||

सातों दिन भगवान के, क्या मंगल क्या पीर|
जिस दिन सोये देर तक, भूखा रहे फकीर||

अच्छी संगत बैठकर, संगी बदले रुप|
जैसे मिलकर आम से मीठी हो गयी धुप||

सपना झरना नींद का, जागी आँखें प्यास|
पाना, खोना, खोजना साँसों का इतिहास||

चाहे गीता बांचिये, या पढिये कुरान|
मेरा तेरा प्यार ही हर पुस्तक का ग्यान||


1. The famous Qaul of Amir Khusro in Qawwali is "Man kunto Maula"

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4 comments:

  1. बहुत ही रोचक जानकारी दी है आपने।

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